(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Mahabharata - कर्णपर्व


॥ श्रीः ॥
8.20. अध्यायः 020
Mahabharata - Karna Parva - Chapter Topics
युधिष्ठिरेण दुर्योधनपराजयः॥ 1 ॥


Mahabharata - Karna Parva - Chapter Text

धृतराष्ट्र उवाच। 8-20-0x(4868)(55829)
अतितीव्राणि दुःखानि दुःसहानि बहूनि च।
त्वत्तोऽहं सञ्जयाश्रौषं पुत्राणां चैव सङ्क्षयम्॥ 8-20-1(55830)
यथा त्वं मे कथयसे यथा युद्वमवर्तत।
न सन्ति सूत कौरव्या इति मे निश्चिता मतिः॥ 8-20-2(55831)
दुर्योधनश्च विरथः कृतस्तत्र महारथः।
धर्मपुत्रः कथं चक्रे तस्य वा नृपतिः कथम्॥ 8-20-3(55832)
अपराह्णे कथं युद्वमभवद्रोमहर्षणम्।
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन कुशलो ह्यसि सञ्जय॥ 8-20-4(55833)
सञ्जय उवाच। 8-20-5x(4869)
संसक्तेषु तु सैन्येषु वध्यमानेषु भागशः।
रथमन्यं समास्थाय पुत्रस्तव विशाम्पते॥ 8-20-5(55834)
क्रोधेन महता युक्तः सविषो भुजगो यथा।
दुर्योधनः समालक्ष्य धर्मराजं युधिष्ठिरम्।
प्रोवाच सूतं त्वरितो याहियाहीति भारत॥ 8-20-6(55835)
तत्र मां प्रापय क्षिप्रं सारथे यत्र पाण्डवः।
ध्रियमाणातप्रतेण राजा राजति दंशितः॥ 8-20-7(55836)
स सूतश्चोदितो राज्ञा राज्ञः स्यन्दनमुत्तमम्।
युधिष्ठिरस्याभिमुखं प्रेषयामास संयुगे॥ 8-20-8(55837)
ततो युधिष्ठिरः क्रुद्वः प्रभिन्न इव कुञ्जरः।
सारथिं चोदयामास याहि यत्र सुयोधनः॥ 8-20-9(55838)
तौ समाजग्मतुर्वीरौ भ्रातरौ रथसत्तमौ॥ 8-20-10(55839)
समेत्य च महावीरौ संरब्धौ युद्वदुर्मदौ।
ववर्षतुर्महेष्वासौ शरैरन्योन्यमाहवे॥ 8-20-11(55840)
ततो दुर्योधनो राजा धर्मशीलस्य मारिष।
शिलाशितेन भल्लेन धनुश्चिच्छेद संयुगे॥ 8-20-12(55841)
तं नामृष्यत सङ्क्रुद्धो ह्यवमानं युधिष्ठिरः।
अपविध्य धनुश्छिन्नं क्रोधसंरक्तलोचनः॥ 8-20-13(55842)
अन्यत्कार्मुकमादाय धर्मपुत्रश्चमूमुखे।
दुर्योधनस्य चिच्छेद ध्वजं कार्मुकमेव च॥ 8-20-14(55843)
अथान्यद्वनुरादाय पुत्रस्ते भरतर्षभ।
`युधिष्ठिरस्य चिक्षेप शरान्कनकभूषणान्।
रुक्मपुङ्खान्प्रसन्नाग्रान्सविषानिव पन्नगान्'॥ 8-20-15(55844)
तावन्योन्यं सुसङ्क्रुद्धौ शस्त्रवर्षाण्यमुञ्चताम्।
सिंहाविव सुसंरब्धौ परस्परजिगीषया॥ 8-20-16(55845)
जघ्नतुस्तौ रणेऽन्योन्यं नर्दमानौ वृषाविव।
अन्तरं मार्गमाणौ च चेरतुस्तौ महारथौ॥ 8-20-17(55846)
ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैस्तौ तु कृतव्रणौ।
विरेजतुर्महाराज किंशुकाविव पुष्पितौ॥ 8-20-18(55847)
ततो राजन्विमुञ्चन्तौ सिंहनादान्मुहुर्मुहुः।
तलयोश्च तथा शब्दान्धनुषश्च महाहवे॥ 8-20-19(55848)
शङ्खशब्दवरांश्चैव चक्रतुस्तौ नरेश्वरौ।
अन्योन्यं तौ महाराज पीडयांचक्रतुर्भृशम्॥ 8-20-20(55849)
ततो युधिष्ठिरो राजा पुत्रं तव शरैस्त्रिभिः।
आजघानोरसि क्रुद्धो वज्रवेगैर्दुरासदैः॥ 8-20-21(55850)
प्रतिविव्याध तं तूर्णं तव पुत्रो महीपतिः।
पञ्चभिर्निशितैर्बाणैः स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः॥ 8-20-22(55851)
ततो दुर्योधनो राजा शक्तिं चिक्षेप भारत।
सर्वपारशवीं तीक्ष्णां महोल्काप्रतिमां तदा॥ 8-20-23(55852)
तामापतन्तीं सहसा धर्मराजः शितैः शरैः।
त्रिभिश्चिच्छेद सहसा तं च विव्याध पञ्चभिः॥ 8-20-24(55853)
निपपात ततः साऽथ स्वर्णदण्डा महास्वना।
निपतन्ती महोल्केव व्यराजच्छिखिसन्निभा॥ 8-20-25(55854)
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशाम्पते।
नवभिर्निशितैर्भल्लैर्निजघान युधिष्ठिरम्॥ 8-20-26(55855)
सोऽतिविद्वो बलवता शत्रुणआ शत्रुतापनः।
दुर्योधनं समुद्दिश्य बाणं जग्राह सत्वरः॥ 8-20-27(55856)
समाधत्त च तं बाणं धनुर्मध्ये महाबलः।
चिक्षेप च महाराज ततः क्रुद्वः पराक्रमी॥ 8-20-28(55857)
स तु बाणः समासाद्य तव पुत्रं महारथम्।
व्यामोहयत राजानं धरणीं च ददार ह॥ 8-20-29(55858)
ततो दुर्योधनः क्रुद्धो गदामुद्यम्य वेगितः।
विधित्सुः कलहस्यान्तं धर्मराजमुपाद्रवत्॥ 8-20-30(55859)
तमुद्यतगदं दृष्ट्वा दण्डहस्तमिवान्तकम्।
धर्मराजो महाशक्तिं प्राहिणोत्तव सूनवे॥ 8-20-31(55860)
दीप्यमानां महावेगां महोल्कां ज्वलितामिव।
यमदण्डनिभां घोरां कालरात्रिमिवापराम्॥ 8-20-32(55861)
रथस्थः स तया विद्वो वर्म भित्त्वा स्तनान्तरे।
भृशं संविग्नहृदयः पपात च मुमोह च॥ 8-20-33(55862)
नभस्तमाह च ततः प्रतिज्ञामनुपालय।
नायं वध्यस्तव नृप इत्युक्तः स न्यवर्तत॥ 8-20-34(55863)
ततस्त्वरितमागम्य कृतवर्मा तवात्मजम्।
प्रत्यपद्यत राजानं निम्नं व्यसनार्णवे॥ 8-20-35(55864)
गदामादाय भीमोऽपि हेमपट्टपरिष्कृताम्।
अभिदुद्राव वेगेन कृतवर्माणमाहवे॥ 8-20-36(55865)
एवं तदभवद्युद्धं त्वदीयानां परैः सह।
अपराह्णे महाराज काङ्क्षतां विजयं युधि॥ ॥ 8-20-37(55866)

इति श्रीमन्महाभारते कर्णपर्वणि षोडशदिवसयुद्धे विंशोऽध्यायः॥ 20 ॥

Mahabharata - Karna Parva - Chapter Footnotes
8-20-1 अतितीव्राणि युद्धानीति क.ट.ड.पाठः॥ 8-20-3 तस्य तं च नृपतिर्दुर्योधनः कथमयुध्यत इति शेषः॥ 8-20-13 अपविध्य त्यक्त्वा॥ 8-20-23 सर्वपारशवीं सर्वपारशवीं सर्वविनाशिनीं गौरादिः। तिरस्कारे विनाशे च पुंसि पारशवः इति मेदिनी॥३ 8-20-25 दीपयन्ती महोल्काभा राजञ्शक्तिर्दिशो दश इति ड.पाठः॥ 8-20-34 भीमस्तमाह च ततः प्रतिज्ञामनुचिन्तयन् इति झ.पाठः॥ 8-20-20 विंशोऽध्यायः॥


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